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International Year of Millets

IYoM: भारत की पहल पर सुपर फूड बनकर खेत-बाजार-थाली में लौटा बाजरा-ज्वार

IYoM: भारत की पहल पर सुपर फूड बनकर खेत-बाजार-थाली में लौटा बाजरा-ज्वार

भारत की पहल से यूएन में हुआ पारित

दो साल में 146% बढ़ी बाजरा की मांग

कुकीज, चिप्स का बढ़ रहा बाजार

“अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥” महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध महा कल्याण की भावना से परिपूर्ण यह महावाक्य भारतीय संसद भवन में भी सुषोभित है। इसका अर्थ है कि, यह अपना बन्धु है और यह अपना नहीं है, इस तरह का हिसाब छोटे चित्त वाले करते हैं। उदार हृदय वालों के लिए तो (सम्पूर्ण) धरती ही कुटुंब है। ”धरती ही परिवार है।” सनातन धर्म के मूल संस्कार एवं इस महान विचारधारा के प्रसार के तहत भारत ने अंतर राष्ट्रीय स्तर पर अन्न के प्रति भारतीय मनीषियों द्वारा प्रदत्त सम्मान के प्रति भी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है। धरती मेरा कुटुंब है, प्राकृतिक कृषि से उदर पोषण कृषक का दायित्व है।, इन विचारों से भले ही दुनिया पहली बार परिचित हो रही हो, लेकिन भारत में यह पंक्तियां, महज विचार न होकर सनातनी परंपरा का अनिवार्य अंग हैं। भारत में कृषि का चलन बहुत पुराना है। हालांकि अंग्रेजी नाम वाली पैक्ड फूड डाइट (Packed Food Diet) के बढ़ते चलने के कारण युवा वर्ग अब इन यूनिवर्सल थॉट्स (सार्वभौमिक विचार) से दूर भी होता जा रहा है। कोदू, कुटकी, जौ, ज्वार, बाजरा जैसे पारंपरिक अनाज की पहचान को आज की पीढ़ी, हिंदी के अंकों, अक्षरों की तरह भुलाती जा रही है। संभव है, कुछ दिन में कॉर्न, सीड्स जैसे नामों के आगे मक्का, बीज जैसे नाम भी विस्मृत हो जाएं!

भारत सरकार की पहल

प्रकृति प्रदत्त अनाज की किस्मों में निहित जीवन मूल्यों की ओर ध्यान आकृष्ट कराने, भारत सरकार ने साल 2018 को ईयर ऑफ मिलेट्स के रूप में मनाने का निर्णय लेकर, देसी अनाज की किस्मों की ओर दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराया। ईयर ऑफ मिलेट्स के तहत सरकारी स्तर पर मोटे अनाज की किस्मों की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने तमाम प्रोत्साहन योजनाएं संचालित की गईं।

अब IYoM

इसके बाद
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) को, अनाज की बिसरा दी गईं किस्मों की ओर लौटकर, प्राकृतिक खेती से दोबारा जुड़ने का भारत का यह तरीका पसंद आया, तो वर्ष 2023 को अंतर राष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स - आईवायओएम (International Year of Millets - IYoM) अर्थात अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।
इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (IYoM) 2023 योजना का सरकारी दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
नैचुरल फार्मिंग (Natural Farming) या प्राकृतिक खेती के दौर में ज्वार, बाजरा, कोदू, कुटकी जैसे मोटे अनाज अब मिलेट्स (MILLET) के रूप में सुपर फूड बनकर धीरे-धीरे फिर से चलन में लौट रहे हैं। क्या आप इक्षु, उर्वास के बारे में जानते हैं। इक्षु अर्थात गन्ना एवं उर्वास यानी ककड़ी, वे नाम हैं जो मिलेट्स (बाजरा, ज्वार) की तरह समय के साथ नाम के रूप में अपनी पहचान बदल चुके हैं।

इस बदलाव की वजह क्या है ?

आखिर क्या वजह है कि दुनिया को अब मोटा अनाज पसंद आने लगा है, करते हैं इस बात की पड़ताल। मोटे अनाज (मिलेट्स/MILLETS) के धरती, प्रकृति और मानव स्वास्थ्य से जुड़े फायदों पर अनुसंधान करने वाले भारत के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय एवं कृषि केंद्रों के शोध अंतर राष्ट्रीय स्तर पर विचार का विषय हैं। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट्स (International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics) भी मिलेट्स की उपयोगिता पर रिसर्च करने में व्यस्त हैं। भारत की ही तरह विश्व के तमाम कृषि अनुसंधान केंद्रों का भी यही मानना है कि, बाजरा, ज्वार, पसई का चावल जैसे मोटे अनाज अब वक्त की जरूरत बन चुके हैं। इनके मुताबिक अनाज की इन किस्मों को खाद्य उपयोग के चलन में लाने के लिए अंतर राष्ट्रीय स्तर पर IYoM जैसे साझा सहयोग की जरूरत है। मतलब मोटे अनाज की किस्मों की न केवल व्यापक स्तर पर खेती की जरूरत है, बल्कि उपजे अनाज के लिए विस्तृत बाजार नेटवर्क भी अपरिहार्य है। कृषि प्रधान देश भारत के नेतृत्व में आयोजित यूएन के IYoM 2023 मिशन के तहत लोगों को मोटे अनाज के लाभों के बारे में जागरूक किया जाएगा। इस तारतम्य के तहत हाल ही में भारत में मिलेट्स पाक उत्सव आयोजित किया गया। इसमें मोटे अनाज से बनने वाले व्यंजनों एवं उसके स्वास्थ्य लाभों के बारे में लोगों को जागरूक कर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया।


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मिलेट्स फूड मेले में लोगों की मौजूदगी ने साबित किया कि, लोग मोटे अनाज के आहार के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इससे पता चलता है कि, मिलेट्स फिर चलन में लौट रहे हैं। मोटे अनाज की फसलों के लिए इसे एक सार्थक संकेत कहा जा सकता है।

मोटे अनाज की कृषि उपयोगिता

मोटा अनाज या बाजरा (मिलेट्स/MILLETS) आम तौर पर किसी भी किस्म की गुणवत्ता वाली मिट्टी में पनप सकता है। इसके लिए किसी खास किस्म की खाद, या रसायन आदि की भी जरूरत नहीं होती। तुलनात्मक रूप से इन फसलों को कीटनाशक की भी आवश्यकता नहीं है।

इसलिए स्मार्ट फूड

मोटा अनाज तेजी से चलन में लौट रहा है। इसमें खेत, जमीन, पर्यावरण के साथ ही मानव स्वास्थ्य से जुड़े लाभ ही लाभ समाहित हैं। ये अनाज धरती, किसान और इंसान के लिए लाभकारी होने के कारण इन्हें सुपर फूड कहा जा रहा है। और अधिक खासियतों की यदि बात करें, तो मोटे अनाज को उपजाने के लिए किसान को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती। यह अन्न किस्में तेज तापमान में भी अपना वजूद कायम रखने में सक्षम हैं। मिलेट्स फार्मिंग किसानों के लिए इसलिए भी अच्छी है, क्योंकि दूसरी फसलों के मुकाबले इनकी खेती आसान है। इसके अलवा कीट पतंगों का भी मोटे अनाज की फसल पर कम असर होता है। कीट जनित रोगों से भी ये बचे रहते हैं। मोटे अनाज (मिलेट्स/MILLETS) मानव के स्वास्थ्य के लिए काफी सेहतकारी हैं। मिलेट्स में पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद रहता है। अनुसंधान के मुताबिक, बाजरे से मधुमेह यानी शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है। कोलेस्ट्रॉल (cholesterol) लेवल में भी इससे सुधार होता है। कैल्शियम, जिंक और आयरन की कमी को भी बाजरा दूर करता है।


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स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मोटे अनाज को आहार में शामिल करने की सलाह लोगों को दे रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में डायबिटीज के लगभग 8 करोड़ मरीज हैं। देश में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इनमें से आधे से अधिक गंभीर रूप से कुपोषित श्रेणी में आते हैँ। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) कुपोषण से मुक्ति के लिए मिलेट्स रिवोल्यूशन (Millets Revolution) की दरकार जता चुके हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार पौष्टिक आहार और अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए भारत को बाजरा क्रांति (Millets Revolution) पर काम करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत के लिए मिलेट्स रिवोल्यूशन इसलिए कठिन नहीं है, क्योंकि मक्के की रोटी, बाजरे के टिक्कड़, खीर आदि के रूप में मोटा अनाज पीढ़ियों से भारतीय थाली का अनिवार्य हिस्सा रहा है। एक तरह से जौ और बाजरा को मानव जाति के इतिहास में खाद्योपयोग में आने वाला प्राथमिक अन्न कहा जा सकता है। सिंधु घाटी की सभ्यता संबंधी अनुसंधानों में बाजरा की खेती के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। भारत के 21 राज्यों में मोटे अनाज की खेती की जाती है। ये मोटे अनाज राज्यों में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार अपना स्थान रखते हैं। राज्यों में मोटे अनाजों (मिलेट्स/MILLETS) को उनकी उपयोगिता एवं जरूरत के हिसाब से उपजाया जाता है। गौरतलब है कि मोटे अनाज प्रकारों से जुड़ी अपनी-अपनी मान्यताएं भी हैं।

भारत में बाजरा पैदावार

भारत प्रतिवर्ष 1.4 करोड़ टन बाजरे की पैदावार करता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक देश माना जाता है। हालांकि बीते 50 सालों में इससे जुड़ी कृषि उत्पादक भूमि घटकर कम होती गई है। यह भूमि 3.8 करोड़ हेक्टेयर से घटकर मात्र 1.3 करोड़ हेक्टेयर के आसपास रह गई है। 1960 के दशक में उत्पन्न बाजरा की तुलना में आज बाजरा की पैदावार कम हो गई है। तब भारत खाद्य सहायता पर निर्भर था। भारत को उस समय देशवासियों के पोषण के लिए अनाज का आयात करना पड़ता था।


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क्यों पिछड़ा सुपर फूड

खाद्य मामलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने एवं कुपोषण पर लगाम कसने के लिए भारत में हरित क्रांति हुई। इसके परिणाम स्वरूप 60 के दशक के उपरांत भारत में गेहूं एवं चावल की अधिक पैदावार वाली किस्मों को खेत में अधिक स्थान मिलता गया। भारत में 1960 और 2015 के बीच गेहूं का उत्पादन तीन गुना से भी अधिक हुआ। चावल के उत्पादन में इस दौरान 8 सौ फीसद वृद्धि हुई। गेहूं, चावल का दायरा जहां इस कालखंड में बढ़ता गया वहीं बाजरा, ज्वार जैसे मोटे अनाज की पैदावार का क्षेत्रफल सिमटता गया। गेहूं अनाज को प्रोत्साहन देने के चक्कर में बाजरा और उसके जैसे दूसरे पारंपरिक ताकतवर मोटे अनाज की अन्य किस्मों की उपेक्षा हुई। नतीजतन मिलेट्स की पैदावार कम होती गई। दरअसल बाजरा और मोटे अनाज को पकाना सभी को नहीं आता एवं उसको खाद्य उपयोगी बनाने के लिए भी काफी समय लगता है। इस कारण दशकों से इनका बेहद कम उपयोग किया जा रहा है। बाजार ने भी मोटे अनाज की उपेक्षा की है।

समझ आई उपयोगिता

प्राकृतिक अनाज आहार के प्रति जागरूक होती आज की पीढ़ी को अब समय के साथ-साथ मोटे अनाज की उपयोगिता समझ आ रही है। भुलाई गई अनाज की इन किस्मों को चलन में वापस लाने के लिए चावल और गेहूं की फसलों की ही तरह सरकारों को खास ध्यान देना होगा। भारतीय कृषि वैज्ञानिक ज्वार, बाजरा जैसे मोटे अनाजों की किस्मों पर व्यापक शोध कर रहे हैं। इनके द्वारा दिए गए सुझावों से किसानों को लाभ भी मिल रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों के दौरान बाजरा की मांग में उल्लेखनीय रूप से 146 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है।

बाजरा में बाजरा

बाजार में अब बाजरा जैसे मोटे अनाज से बने तमाम प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं। मिलेट का आटा, कुकीज, चिप्स आदि पैक्ड आइटम्स की खुदरा बाजार, सुपर मार्केट एवं ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खासी डिमांड है।


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पीडीएस प्रोसेस

भारत में पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम - पीडीएस (Public Distribution Service - PDS) यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से हितग्राहियों को 1 रुपया प्रति किलो की दर से बाजरा प्रदान किया जा रहा है। कुछ राज्यों में मोटे अनाज से बने व्यजनों को दोपहर आहार (मिड डे मील - Mid Day Meal Scheme) योजना के तहत परोसा जा रहा है। मतलब सरकार और बाजार को बाजरे की मार्केट वैल्यू पता लगने पर इसकी हैसियत लगातार बढ़ती जा रही है। गरीब का भोजन बताकर किनारे कर दिया गया बाजरा जैसा ताकतवर अनाज, सुपर फूड मिलेट्स (MILLETS) के रूप में फिर नई पहचान बना रहा है।
बाजरा एक जादुई फसल है, जो इम्युनिटी पावर को बढ़ाती है

बाजरा एक जादुई फसल है, जो इम्युनिटी पावर को बढ़ाती है

बाजरा प्रोटीन, फाइबर, प्रमुख विटामिन और खनिजों का एक अच्छा स्रोत है। बाजरा हृदय स्वास्थ्य की रक्षा करने में मदद करता है, मधुमेह की शुरुआत को रोकता है

महाराष्ट्र के कुछ आंतरिक भागों में, कम वर्षा फसलों की वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।

एक केस स्टडी के अनुसार, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा मंडल के 27 वर्षीय किसान अंकित शर्मा को कम वर्षा पैटर्न के कारण प्रति वर्ष 5 लाख का नुकसान हुआ। चूँकि भारत में वर्षा का पैटर्न कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे; एल नीनो । ला लीना, उच्च दबाव (hp) और कम दबाव (lp), हिंद महासागर द्विध्रुवीय आंदोलन। वर्षा की समस्या को हल करने के लिए भारत सरकार और कई राज्य सरकारों ने प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसी सिंचाई योजनाओं की शुरुआत की, जिससे इस जटिल समस्या का कुछ हद तक समाधान हुआ है, लेकिन यह लंबे समय तक संभव नहीं है।

समाधान बाजरे की खेती है, जो भारत की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल है।

2023 में अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2018 में खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा अनुमोदित किया गया था और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को बाजरा का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। ओडिशा सरकार ने ओडिशा मिलेट मिशन (OMM) लॉन्च किया था। जिसका उद्देश्य किसानों को उन फसलों को उगाने के लिए प्रोत्साहित करके अपने खेतों और खाद्य प्लेटों में बाजरा वापस लाना है। जो पारंपरिक रूप से आदिवासी क्षेत्रों में आहार और फसल प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा हैं।

यदि हम बाजरे के महत्व पर विचार करें तो यह एक लंबी सूची है।

पोषण से भरपूर:

बाजरा प्रोटीन, फाइबर, प्रमुख विटामिन और खनिजों का एक अच्छा स्रोत है। बाजरा हृदय स्वास्थ्य की रक्षा करने में मदद करता है, मधुमेह की शुरुआत को रोकता है, लोगों को स्वस्थ वजन हासिल करने और बनाए रखने में मदद करता है, और आंत में सूजन का प्रबंधन करता है।

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कम पानी की आवश्यकता होती है:

बाजरा अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय में एक महत्वपूर्ण प्रधान है। जरूरतमंद व्यक्तियों के लिए भोजन और पोषण सुरक्षा की गारंटी देता है, जो कम वर्षा और मिट्टी की उर्वरता के कारण अन्य खाद्य फसलें नहीं उगा सकते हैं।

मध्यम उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है:

वे कम से मध्यम उपजाऊ मिट्टी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बढ़ सकते हैं। ज्वार, बाजरा और रागी भारत में विकसित प्रमुख बाजरा हैं।

लाभदायक फसल:

बाजरा किसानों के लिए खेती के प्राथमिक लक्ष्यों जैसे लाभ, बहुमुखी प्रतिभा और प्रबंधनीयता को प्राप्त करने के लिए अच्छा विकल्प है।

सूखा प्रतिरोधी और टिकाऊ:

बाजरा भविष्य का 'अद्भुत अनाज' है। क्योंकि वे सूखा प्रतिरोधी है, जिन्हें कुछ बाहरी आदानों की आवश्यकता होती है। कठोर परिस्थितियों के खिलाफ अपने उच्च प्रतिरोध के कारण, मोटे अनाज पर्यावरण के लिए, इसे उगाने वाले किसानों के लिए टिकाऊ होते हैं। सभी के लिए सस्ते और उच्च पोषक विकल्प प्रदान करते हैं।

लंबी शेल्फ लाइफ:

भारत में उत्पादित लगभग 40 प्रतिशत भोजन हर साल बर्बाद हो जाता है। बाजरा आसानी से नष्ट नहीं होता है, और कुछ बाजरा 10-12 साल बढ़ने के बाद भी खाने के लिए अच्छे होते हैं, इस प्रकार खाद्य सुरक्षा प्रदान करते हैं, और भोजन की बर्बादी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूँकि सरकार बाजरा उगाने के लिए प्रचार कर रही है, इसलिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएँ शुरू की गई हैं। उचित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की पहल के साथ समर्पित कार्यक्रम जो किसानों को घाटे वाली फसलों से दूर बाजरा के माध्यम से विविधीकरण की ओर ले जाने का आग्रह करते हैं, किसानों को दूर करने का एक समयोचित तरीका हो सकता है।

यह राज्य कर रहा है मिलेट्स के क्षेत्रफल में दोगुनी बढ़ोत्तरी

यह राज्य कर रहा है मिलेट्स के क्षेत्रफल में दोगुनी बढ़ोत्तरी

साल 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार मिलेट्स के क्षेत्रफल को बढ़ाएगी। प्रदेश सरकार इस रकबे को 11 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 25 लाख तक करेगी। राज्य सरकार ने अपने स्तर से तैयारियों का शुभारंभ क्र दिया है। आने वाले साल 2023 को दुनिया मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाएगी। मिलेट्स वर्ष मनाए जाने की पहल एवं इसकी शुरुआत में भारत सरकार की अहम भूमिका रही है। भारत में मिलेट्स का उत्पादन अन्य सभी देशों से अधिक होता है। देश का मोटा अनाज पूरी दुनिया में अपना एक विशेष स्थान रखता है। इसी वजह से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी मोटे अनाज को उत्सव के तौर पर मनाकर देश की प्रसिद्ध को दुनियाभर में फैलाना चाहते हैं। कुछ ही दिन पहले मोदी जी ने दिल्ली में आयोजित हुए एक कार्यक्रम में मोटे अनाज का बना हुआ खाना खाया था। भारत के विभिन्न राज्यों में मोटा अनाज का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। मिलेट्स इयर आने की वजह से उत्तर प्रदेश राज्य में मोटे अनाज के उत्पादन का क्षेत्रफल बाद गया है।

उत्तर प्रदेश राज्य कितने हैक्टेयर में करेगा मोटे अनाज का उत्पादन

खबरों के मुताबिक, प्रदेश के मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र ने मिलेट्स इयर के संबंध में राज्य के कृषि विभाग के अधिकारीयों को बुलाकर इस विषय पर बैठक की है। इस बैठक में जिस मुख्य विषय पर चर्चा की गयी वह यह था, कि वर्तमान में 11 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज का उत्पादन हो रहा है। इसको साल 2023 में 25 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाया जाए। हालाँकि लक्ष्य थोड़ा ज्यादा बड़ा है, विभाग के अधिकारी पहले से ही इस बात के लिए तैयारी में जुट जाएँ।


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उत्तर प्रदेश सरकार ने कितना लक्ष्य तय किया है

राज्य सरकार द्वारा अधीनस्थों को आगामी वर्ष में मोटे अनाज का क्षेत्रफल दोगुने से ज्यादा वृद्धि का आदेश दिया है। बतादें, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोटे अनाज से संबंधित पहल को बेहद ही गहनता पूर्वक लिया गया है। साथ ही, इस विषय के लिए उत्तर प्रदेश सरकार भी काफी गंभीरता दिखा रही है। उत्तर प्रदेश में सिंचित क्षेत्रफल का इलाका 86 फीसद हैं। बतादें, कि इस रकबे में दलहन, तिलहन, धान, गेहूं का उत्पादन किया जाता जाती है।

कहाँ से खरीदेगी सरकार बीज

कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देेश दिया गया है, कि कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश आदि राज्यों के अधिकारियों से संपर्क साधें। राज्य में बुआई हेतु मोटे अनाज के बीज की बेहतरीन व्यवस्था की जाए। सबसे पहली बार 18 जनपदों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बाजरा खरीदा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में कितना किया जायेगा अनाज का उत्पादन

उत्तर प्रदेश के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में मोटे अनाज की मुख्य फसलें जिनका अच्छा उत्पादन भी होता है, वह ज्वार एवं बाजरा हैं। महाराष्ट्र राजस्थान, उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर बाजरा का उत्पादन किया जाता है। क्षेत्रफलानुसार बात की जाए तो उत्तर प्रदेश 9 .04 लाख हेक्टेयर, महाराष्ट्र में 6.88, राजस्थान में 43.48 लाख हेक्टेयर में बाजरे का उत्पादन किया जाता है। वहीं, उत्तर प्रदेश राज्य की पैदावार प्रति हेक्टेयर 2156 किलो ग्राम है। राजस्थान का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 1049 किलोग्राम एवं महाराष्ट्र की पैदावार की बात करें तो 955 किलो ग्राम है।

ज्वार के उत्पादन का क्षेत्रफल कितना बढ़ा है

राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में ज्वार का अच्छा खासा उत्पादन होता है। क्षेत्रफल के तौर पर कर्नाटक प्रति हेक्टेयर प्रति क्विंटल पैदावार के मामले में अव्वल स्थान है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ज्वार की पैदावार बढ़ाने के लिए काफी जोर दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2022 में 1.71 लाख हेक्टेयर उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन वर्ष 2023 में इसको 1.71 लाख हैक्टेयर से बढ़ाकर 2.24 लाख हेक्टेयर तक पहुँचा दिया है। इसी प्रकार सावां व कोदो का रकबा भी पहले से दोगुना कर दिया गया है।
मोटे अनाज (मिलेट) की फसलों का महत्व, भविष्य और उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी

मोटे अनाज (मिलेट) की फसलों का महत्व, भविष्य और उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी

भारत के किसान भाइयों के लिए मिलेट की फसलें आने वाले समय में अच्छी उपज पाने हेतु अच्छा विकल्प साबित हो सकती हैं। आगे इस लेख में हम आपको मिलेट्स की फसलों के बारे में अच्छी तरह जानकारी देने वाले हैं। मिलेट फसलें यानी कि बाजरा वर्गीय फसलें जिनको अधिकांश किसान मिलेट अनाज वाली फसलों के रूप में जानते हैं। मिलेट अनाज वाली फसलों का अर्थ है, कि इन फसलों को पैदा करने एवं उत्पादन लेने के लिए हम सब किसान भाइयों को काफी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। समस्त मिलेट फसलों का उत्पादन बड़ी ही आसानी से लिया जा सकता है। जैसे कि हम सब किसान जानते हैं, कि सभी मिलेट फसलों को उपजाऊ भूमि अथवा बंजर भूमि में भी पैदा कर आसान ढ़ंग से पैदावार ली जा सकती है। मिलेट फसलों की पैदावार के लिए पानी की जरुरत होती है। उर्वरक का इस्तेमाल मिलेट फसलों में ना के समान होता है, जिससे किसान भाइयों को ज्यादा खर्च से सहूलियत मिलती है। जैसा कि हम सब जानते हैं, कि हरित क्रांति से पूर्व हमारे भारत में उत्पादित होने वाले खाद्यान्न में मिलेट फसलों की प्रमुख भूमिका थी। लेकिन, हरित क्रांति के पश्चात इनकी जगह धीरे-धीरे गेहूं और धान ने लेली और मिलेट फसलें जो कि हमारी प्रमुख खाद्यान्न फसल हुआ करती थीं, वह हमारी भोजन की थाली से दूर हो चुकी हैं।

भारत मिलेट यानी मोटे अनाज की फसलों की पैदावार में विश्व में अव्वल स्थान पर है

हमारा भारत देश आज भी मिलेट फसलों की पैदावार के मामले में विश्व में सबसे आगे है। इसके अंतर्गत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, झारखंड, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसान भाई बड़े पैमाने पर मोटे अनाज यानी मिलेट की खेती करते हैं। बतादें, कि असम और बिहार में सर्वाधिक मोटे अनाज की खपत है। दानों के आकार के मुताबिक, मिलेट फसलों को मुख्यतः दो हिस्सों में विभाजित किया गया है। प्रथम वर्गीकरण में मुख्य मोटे अनाज जैसे बाजरा और ज्वार आते हैं। तो उधर दूसरे वर्गीकरण में छोटे दाने वाले मिलेट अनाज जैसे रागी, सावा, कोदो, चीना, कुटुकी और कुकुम शम्मिलित हैं। इन छोटे दाने वाले, मिलेट अनाजों को आमतौर पर कदन्न अनाज भी कहा जाता है।

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वर्ष 2023 को "अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष" के रूप में मनाया जा रहा है

जैसा कि हम सब जानते है, कि वर्ष 2023 को “अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष” के रूप में मनाया जा रहा है। भारत की ही पहल के अनुरूप पर यूएनओ ने वर्ष 2023 को मिलेट वर्ष के रूप में घोषित किया है। भारत सरकार ने मिलेट फसलों की खासियत और महत्ता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018 को “राष्ट्रीय मिलेट वर्ष” के रूप में मनाया है। भारत सरकार ने 16 नवम्बर को “राष्ट्रीय बाजरा दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

मिलेट फसलों को केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर से बढ़ावा देने की कोशिशें कर रही हैं

भारत सरकार द्वारा मिलेट फसलों की महत्ता को केंद्र में रखते हुए किसान भाइयों को मिलेट की खेती के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। मिलेट फसलों के समुचित भाव के लिए सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा किया जा रहा है। जिससे कि कृषकों को इसका अच्छा फायदा मिल सके। भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के स्तर से मिलेट फसलों के क्षेत्रफल और उत्पादन में बढ़ोत्तरी हेतु विभिन्न सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिससे किसान भाई बड़ी आसानी से पैदावार का फायदा उठा सकें। सरकारों द्वारा मिलेट फसलों के पोषण और शरीरिक लाभों को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण एवं शहरी लोगों के मध्य जागरूकता बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है। जलवायु परिवर्तन ने भी भारत में गेहूं और धान की पैदावार को बेहद दुष्प्रभावित किया है। इस वजह से सरकार द्वारा मोटे अनाज की ओर ध्यान केन्द्रित करवाने की कोशिशें की जा रही हैं।

मिलेट यानी मोटे अनाज की फसलों में पोषक तत्व प्रचूर मात्रा में विघमान रहते हैं

मिलेट फसलें पोषक तत्वों के लिहाज से पारंपरिक खाद्यान गेहूं और चावल से ज्यादा उन्नत हैं। मिलेट फसलों में पोषक तत्त्वों की भरपूर मात्रा होने की वजह इन्हें “पोषक अनाज” भी कहा जाता है। इनमें काफी बड़ी मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-E विघमान रहता है। कैल्शियम, पोटैशियम, आयरन कैल्शियम, मैग्नीशियम भी समुचित मात्रा में पाया जाता है। मिलेट फसलों के बीज में फैटो नुत्त्रिएन्ट पाया जाता है। जिसमें फीटल अम्ल होता है, जो कोलेस्ट्राल को कम रखने में सहायक साबित होता है। इन अनाजों का निमयित इस्तेमाल करने वालों में अल्सर, कोलेस्ट्राल, कब्ज, हृदय रोग और कर्क रोग जैसी रोगिक समस्याओं को कम पाया गया है।

मिलेट यानी मोटे अनाज की कुछ अहम फसलें

ज्वार की फसल

ज्वार की खेती भारत में प्राचीन काल से की जाती रही है। भारत में ज्वार की खेती मोटे दाने वाली अनाज फसल और हरे चारे दोनों के तौर पर की जाती है। ज्वार की खेती सामान्य वर्षा वाले इलाकों में बिना सिंचाई के हो रही है। इसके लिए उपजाऊ जलोड़ एवं चिकिनी मिट्टी काफी उपयुक्त रहती है। ज्वार की फसल भारत में अधिकांश खरीफ ऋतु में बोई जाती है। जिसकी प्रगति के लिए 25 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस तक तापमान ठीक होता है। ज्वार की फसल विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में की जाती है। ज्वार की फसल बुआई के उपरांत 90 से 120 दिन के समयांतराल में पककर कटाई हेतु तैयार हो जाती है। ज्वार की फसल से 10 से 20 क्विंटल दाने एवं 100 से 150 क्विंटल हरा चारा प्रति एकड़ की उपज है। ज्वार में पोटैशियम, फास्पोरस, आयरन, जिंक और सोडियम की भरपूर मात्रा पाई जाती है। ज्वार का इस्तेमाल विशेष रूप से उपमा, इडली, दलिया और डोसा आदि में किया जाता है।

बाजरा की फसल

बाजरा मोटे अनाज की प्रमुख एवं फायदेमंद फसल है। क्योंकि, यह विपरीत स्थितियों में एवं सीमित वर्षा वाले इलाकों में एवं बहुत कम उर्वरक की मात्रा के साथ बेहतरीन उत्पादन देती हैं जहां अन्य फसल नहीं रह सकती है। बाजरा मुख्य रूप से खरीफ की फसल है। बाजरा के लिए 20 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल रहता है। बाजरे की खेती के लिए जल निकास की बेहतर सुविधा होने चाहिए। साथ ही, काली दोमट एवं लाल मिट्टी उपयुक्त हैं। बाजरे की फसल से 30 से 35 क्विंटल दाना एवं 100 क्विंटल सूखा चारा प्रति हेक्टेयर की पैदावार मिलती है। बाजरे की खेती मुख्य रूप से गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में की जाती है। बाजरे में आमतौर पर जिंक, विटामिन-ई, कैल्शियम, मैग्नीशियम, कॉपर तथा विटामिन-बी काम्प्लेक्स की भरपूर मात्रा उपलब्ध है। बाजरा का उपयोग मुख्य रूप से भारत के अंदर बाजरा बेसन लड्डू और बाजरा हलवा के तौर पर किया जाता है।

रागी (मंडुआ) की फसल

विशेष रूप से रागी का प्राथमिक विकास अफ्रीका के एकोपिया इलाके में हुआ है। भारत में रागी की खेती तकरीबन 3000 साल से होती आ रही है। रागी को भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न मौसम में उत्पादित किया जाता है। वर्षा आधारित फसल स्वरुप जून में इसकी बुआई की जाती है। यह सामान्यतः आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार, तमिलनाडू और कर्नाटक आदि में उत्पादित होने वाली फसल है। रागी में विशेष रूप से प्रोटीन और कैल्शियम ज्यादा मात्रा में होता है। यह चावल एवं गेहूं से 10 गुना ज्यादा कैल्शियम व लौह का अच्छा माध्यम है। इसलिए बच्चों के लिए यह प्रमुख खाद्य फसल हैं। रागी द्वारा मुख्य तौर पर रागी चीका, रागी चकली और रागी बालूसाही आदि पकवान निर्मित किए जाते हैं।

कोदों की फसल

भारत के अंदर कोदों तकरीबन 3000 साल पहले से मौजूद था। भारत में कोदों को बाकी अनाजों की भांति ही उत्पादित किया जाता है। कवक संक्रमण के चलते कोदों वर्षा के बाद जहरीला हो जाता है। स्वस्थ अनाज सेहत के लिए फायदेमंद होता है। इसकी खेती अधिकांश पर्यावरण के आश्रित जनजातीय इलाकों में सीमित है। इस अनाज के अंतर्गत वसा, प्रोटीन एवं सर्वाधिक रेसा की मात्रा पाई जाती है। यह ग्लूटन एलजरी वाले लोगो के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त है। इसका विशेष इस्तेमाल भारत में कोदो पुलाव एवं कोदो अंडे जैसे पकवान तैयार करने हेतु किया जाता है।

सांवा की फसल

जानकारी के लिए बतादें, कि लगभग 4000 वर्ष पूर्व से इसकी खेती जापान में की जाती है। इसकी खेती आमतौर पर सम शीतोष्ण इलाकों में की जाती है। भारत में सावा दाना और चारा दोनों की पैदावार के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार और तमिलनाडू में उत्पादित किया जाता है। सांवा मुख्य फैटी एसिड, प्रोटीन, एमिलेज की भरपूर उपलब्ध को दर्शाता है। सांवा रक्त सर्करा और लिपिक स्तर को कम करने के लिए काफी प्रभावी है। आजकल मधुमेह के बढ़ते हुए दौर में सांवा मिलेट एक आदर्श आहार बनकर उभर सकता है। सांवा का इस्तेमाल मुख्य तौर पर संवरबड़ी, सांवापुलाव व सांवाकलाकंद के तौर पर किया जाता है।

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चीना की फसल

चीना मिलेट यानी मोटे अनाज की एक प्राचीन फसल है। यह संभवतः मध्य व पूर्वी एशिया में पाई जाती है, इसकी खेती यूरोप में नव पाषाण काल में की जाती थी। यह विशेषकर शीतोष्ण क्षेत्रों में उत्पादित की जाने वाली फसल है। भारत में यह दक्षिण में तमिलनाडु और उत्तर में हिमालय के चिटपुट इलाकों में उत्पादित की जाती है। यह अतिशीघ्र परिपक्व होकर करीब 60 से 65 दिनों में तैयार होने वाली फसल है। इसका उपभोग करने से इतनी ऊर्जा अर्जित होती है, कि व्यक्ति बिना थकावट महसूस किये सुबह से शाम तक कार्यरत रह सकते हैं। जो कि चावल और गेहूं से सुगम नहीं है। इसमें प्रोटीन, रेशा, खनिज जैसे कैल्शियम बेहद मात्रा में पाए जाते हैं। यह शारीरिक लाभ के गुणों से संपन्न है। इसका इस्तेमाल विशेष रूप से चीना खाजा, चीना रवा एडल, चीना खीर आदि में किया जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने किया तीन दिवसीय वर्ल्ड फूड इंडिया​ प्रदर्शनी का उद्घाटन

प्रधानमंत्री मोदी ने किया तीन दिवसीय वर्ल्ड फूड इंडिया​ प्रदर्शनी का उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मेगा फूड इवेंट वर्ल्ड फूड इंडिया का उद्घाटन करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी 1 लाख से ज्यादा एसएचजी को प्रारंभिक पूंजी मदद वितरित करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित किए गए इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन प्रगति मैदान के भारत मंडपम में किया जा रहा है, जिसमें 80 से ज्यादा देशों के 1 हजार दो सौ से ज्यादा प्रदर्शक एवं प्रतिभागी हिस्सा लेंगे। प्रधानमंत्री मोदी इस कार्यक्रम के लिए 1 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को कार्यशील पूंजी मदद भी वितरित करेंगे। इसके अतिरिक्त पीएम फूड स्ट्रीट का उद्घाटन भी करेंगे। बतादें, कि विश्व को समृद्ध भारतीय खाद्य संस्कृति को दिखाने के लिए अनेकों मंडप स्थापित किए गए हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर तकरीबन 50 संवाद सत्र भी आयोजित किए जाऐंगे। बतादें, कि इस कार्यक्रम का समापन 5 नवंबर को किया जाएगा।

पीएम मोदी सहयोग पूँजी का भी वितरण करेंगे

इस दौरान पीएम मोदी स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने के लिए एक लाख से अधिक एसएचजी सदस्यों के लिए प्रारंभिक पूंजी सहयोग वितरित करेंगे। पीएमओ की तरफ से कहा गया है, कि इस समर्थन से एसएचजी को शानदार पैकेजिंग एवं गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण के माध्यम से बाजार में शानदार मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

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भारत को दुनिया की खाद्य टोकरी के रूप में दिखाया जा रहा है

दरअसल, इस कार्यक्रम का प्रमुख लक्ष्य भारत को 'दुनिया की खाद्य टोकरी' के तौर पर प्रदर्शित करना है। साथ ही, साल 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के तौर पर मनाना भी है। यह कार्यक्रम सरकारी निकायों, उद्योग के पेशेवरों, किसानों, उद्यमियों एवं अन्य हितधारकों को चर्चा में शामिल होने, साझेदारी स्थापित करने और कृषि-खाद्य क्षेत्र में निवेश के अवसरों की जानकारी करने के लिए एक नेटवर्किंग और व्यापार मंच देगा।

कार्यक्रम में विदेशी खरीदार भी शामिल होंगे

भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में नवाचार एवं उसके सामर्थ्य का प्रदर्शन करने के लिए भिन्न-भिन्न मंडप स्थापित किए हैं। इसके साथ ही कार्यक्रम के अंदर गुणवत्ता आश्वासन, वित्तीय सशक्तिकरण और मशीनरी तथा प्रौद्योगिकी में नवाचार पर बल देने के लिए 48 सेशन भी आयोजित किए जाऐंगे। वर्ल्ड फूड इंडिया कार्यक्रम में 80 से अधिक देशों के 1200 से ज्यादा विदेशी खरीदार शम्मिलित होंगे। इवेंट का आयोजन नीदरलैंड पार्टनर के तौर पर कार्य करेगा। साथ ही, जापान कार्यक्रम का केंद्रबिंदु देश होगा।

मोटे अनाज यानी ज्वार, बाजरा और रागी का सेवन करने से होने वाले लाभ

मोटे अनाज यानी ज्वार, बाजरा और रागी का सेवन करने से होने वाले लाभ

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ज्वार, बाजरा एवं रागी जैसे मोटे अनाजों में फाइबर, विटामिंस, आयरन और प्रोटीन जैसे मिनरल तत्व भरपूर मात्रा में उपस्थित होते हैं। इसके साथ ही ये अनाज ग्लूटन-फ्री सुपरफूड्स के रूप में जाने जाते हैं, जो डाइबिटीज को नियंत्रित करने में बेहद सहायता करते हैं। ऐसी स्थिति में आज हम आपको मोटे अनाज जैसे कि रागी, बाजरा और ज्वार का सेवन करने से होने वाले लाभों के विषय में बताऐंगे। विगत दीर्घकाल से ना सिर्फ भारत में, बल्कि विश्वभर में लोगों के मध्य मोटे अनाजों की चर्चा काफी तीव्र हो गई है। क्योंकि इस साल यानी कि 2023 को भारत सरकार के आह्वान पर इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स के रूप में मनाया जा रहा है। मोटे अनाजों की खेती तथा इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने में जुटी भारत सरकार लगातार इस बात के प्रयास में जुटी है, कि मोटे अनाजों की पहुंच भारत में हर घर तक बने। साथ ही, मोटे अनाज का सेवन करने से होने वाले लाभों के विषय में लोगों को जानकारी मिल सके।

श्री अन्न यानी मोटे अनाज का सेवन करने से होने वाले लाभ

दरअसल, ये तो स्पष्ट तौर पर जाहिर है, कि ज्वार, बाजरा तथा रागी जैसे मोटे अनाज विटामिंस, आयरन, प्रोटीन और फाइबर जैसे मिनरल तत्वों से भरपूर होते हैं। साथ ही, ये अनाज ग्लूटन-फ्री सुपरफूड्स के रूप में जाने जाते हैं, जो कि डाइबिटीज को नियंत्रित करने में बेहद सहायता करते हैं। अगर हम बात करें ग्लूटन की तो, ग्लूटन एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो गेहूं, जौ एवं राई में पाया जाता है। इसके साथ ही ग्लूटन-फ्री डाइट सेहत में सुधार लाने, वजन घटाने एवं एनर्जी बढ़ाने में सहायता करती है।

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साथ ही, जिन व्यक्तियों को हृदय संबंधित बीमारियां हैं, उनके लिए मिलेट्स खाना लाभदायक साबित हो सकता है। क्योंकि ज्वार और बाजरा खाने से ब्लड सर्कूलेशन काफी अच्छा रहता है। ऐसी स्थिति में यदि आप दिल के मरीज हैं, तो आप ज्वार और बाजरा का सेवन अवश्य करें। इसके अतिरिक्त पेट में कब्ज हो अथवा एसिडिटी, पाचन शक्ति को बढ़ाने में भी श्री अन्न काफी लाभदायक साबित होता है। बतादें, कि मोटे अनाजों को इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में भी जाना जाता है। अस्थमा, मेटाबॉलिज्म और डायबिटीज जैसी विभिन्न स्वास्थ्य परेशानियों को दूर करने में मोटे अनाजों को शानदार माना गया है।

मोटे अनाजों का सेवन इन बीमारियों से ग्रसित लोग ना करें

हाइपोथायरायडिज्म, जिसको अंडरएक्टिव थायरॉयड ग्रंथि के नाम से भी जाना जाता है। यदि कोई व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है, तो उन्हें मोटे अनाजों का सेवन करने से बचना चाहिए। क्योंकि, मोटे अनाज में गोइट्रोजेन होता है जो आयोडीन के अवशोषण में बाधा पैदा कर सकता है। हालांकि, जब खाना पकाया जाता है, तो पकने की वजह से इसमें मौजूद गोइट्रोजेन की मात्रा कम हो सकती है। परंतु, इसको पूर्णतय समाप्त नहीं किया जा सकता।